नई दिल्ली: अमेरिका की टैरिफ नीति और भारत-अमेरिका संबंधों में आए तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में बदलाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हुई है। भारत अब किसी एक बड़े देश पर आर्थिक और रणनीतिक निर्भरता कम करने के लिए अलग-अलग देशों के साथ व्यापार, निवेश और रक्षा संबंधों को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की लगातार विदेश यात्राओं और भारत आने वाले विदेशी नेताओं की बढ़ती संख्या को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इस नीति का मकसद केवल कूटनीतिक संबंध बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत के लिए नए निर्यात बाजार, निवेश के अवसर और रणनीतिक साझेदार तैयार करना भी है।
ट्रंप के टैरिफ के बाद भारत ने क्यों बदली रणनीति?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति ने भारत समेत कई देशों के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। अमेरिकी टैरिफ बढ़ने से भारतीय उत्पादों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा रूस से भारत की ऊर्जा खरीद को लेकर भी वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच मतभेद सामने आए हैं। ऐसे माहौल में भारत के लिए किसी एक बाजार या एक रणनीतिक साझेदार पर अत्यधिक निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
यही वजह है कि भारत की विदेश नीति में अब कई देशों के साथ एक साथ आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते विकसित करने पर जोर दिखाई देता है। विशेषज्ञ इसे बहुपक्षीय या प्लूरिलेटरल कूटनीति के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ते हैं। इसमें भारत अलग-अलग देशों और समूहों के साथ अपने हितों के अनुसार साझेदारी करता है, ताकि किसी एक देश के साथ संबंध खराब होने की स्थिति में आर्थिक या रणनीतिक विकल्प सीमित न हों।
PM मोदी की विदेश यात्राओं के पीछे क्या रणनीति है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं को अक्सर केवल कूटनीतिक मुलाकातों के रूप में देखा जाता है, लेकिन इनके दौरान व्यापार, निवेश, रक्षा, ऊर्जा, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े समझौतों पर भी बातचीत होती रही है। भारत का प्रयास है कि अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग देशों के साथ मजबूत साझेदारी विकसित की जाए।
यूरोप, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान, कनाडा और पश्चिम एशिया के देशों के साथ भारत के संबंधों को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। भारत जहां पश्चिमी देशों के साथ व्यापार और तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है, वहीं रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंधों को भी बनाए हुए है। दूसरी तरफ चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद बहुपक्षीय मंचों पर भारत संवाद के रास्ते खुले रखता है।
यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौता क्यों अहम है?
भारत की इस रणनीति में यूरोपीय बाजार विशेष महत्व रखते हैं। यूरोपीय संघ दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक समूहों में से एक है और भारत लंबे समय से यूरोपीय देशों के साथ व्यापक मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में काम करता रहा है। ऐसे समझौते भारतीय कंपनियों के लिए बड़े बाजार खोल सकते हैं और निर्यात को बढ़ावा दे सकते हैं।
व्यापार समझौतों में दोनों पक्षों को कुछ क्षेत्रों में रियायतें देनी पड़ती हैं। भारत के लिए चुनौती यह रहती है कि विदेशी बाजारों तक बेहतर पहुंच हासिल करने के साथ घरेलू उद्योगों के हितों की भी रक्षा की जाए। इसी कारण भारत की व्यापार वार्ताओं में ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, कृषि, शराब और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर लंबी बातचीत होती रही है।
ब्रिटेन, जापान और ऑस्ट्रेलिया पर भी फोकस
भारत ने ब्रिटेन के साथ व्यापार संबंधों को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते का उद्देश्य बाजार पहुंच बढ़ाना और भारतीय तथा ब्रिटिश कंपनियों के लिए कारोबारी अवसरों का विस्तार करना है। भारतीय टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और अन्य निर्यात क्षेत्रों के लिए ब्रिटिश बाजार महत्वपूर्ण है।
इसी तरह जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत के रिश्ते व्यापार से आगे बढ़कर रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग तक पहुंच चुके हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत इन देशों के साथ समुद्री सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और तकनीकी सहयोग को भी महत्व देता है।
मिडिल ईस्ट और मिडिल एशिया में भारत की बढ़ती मौजूदगी
भारत की नई कूटनीतिक रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पश्चिम एशिया और मध्य एशिया भी है। खाड़ी देशों के साथ भारत के ऊर्जा, निवेश और प्रवासी भारतीयों से जुड़े मजबूत संबंध हैं। भारत के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा है।
मध्य एशिया में भी भारत कनेक्टिविटी, ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग के विकल्प तलाश रहा है। रूस, चीन और मध्य एशियाई देशों के साथ संवाद के लिए शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO जैसे मंच भारत को एक अतिरिक्त कूटनीतिक माध्यम उपलब्ध कराते हैं। हालांकि, SCO के भीतर भारत और चीन के बीच कई रणनीतिक मतभेद भी मौजूद हैं।
रूस के साथ संबंध बनाए रखना भारत के लिए क्यों जरूरी?
अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंध मजबूत करने के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने पारंपरिक रणनीतिक संबंधों को पूरी तरह खत्म नहीं किया है। रूस भारत के लिए लंबे समय से रक्षा उपकरणों और ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से भारत की कच्चे तेल की खरीद ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के साथ नई बहस को जन्म दिया।
भारत का तर्क रहा है कि उसकी ऊर्जा नीति का प्रमुख उद्देश्य देश की ऊर्जा सुरक्षा और भारतीय उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना है। रूस से अपेक्षाकृत सस्ती ऊर्जा खरीद ने भारतीय रिफाइनिंग और ऊर्जा बाजार को भी प्रभावित किया है। यही मुद्दा अमेरिका-भारत संबंधों में तनाव के कारणों में शामिल रहा है।
भारत-अमेरिका संबंधों में टैरिफ बना बड़ा मुद्दा
डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति के तहत भारतीय उत्पादों पर ऊंचे शुल्क और रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव ने दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को चुनौती दी है। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार असंतुलन, बाजार पहुंच, टैरिफ और कृषि जैसे मुद्दों पर पहले से बातचीत चलती रही है।
भारत के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ अमेरिका जैसे बड़े बाजार के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ निर्यात के लिए वैकल्पिक बाजार विकसित करना भी महत्वपूर्ण है। इसी वजह से यूरोप, ब्रिटेन, एशिया, पश्चिम एशिया और अन्य क्षेत्रों के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत करना भारत की आर्थिक रणनीति का हिस्सा बनता जा रहा है।
क्या यह ट्रंप को जवाब देने का ‘मास्टर स्ट्रोक’ है?
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं और अलग-अलग देशों के साथ बढ़ते संबंधों को सीधे तौर पर केवल ट्रंप की टैरिफ नीति का जवाब मानना पूरी तस्वीर नहीं होगी। भारत की बहुपक्षीय विदेश नीति पर काम लंबे समय से चल रहा है और इसके पीछे ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा जरूरतें, निवेश, निर्यात बाजार, चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका जैसे कई कारण हैं।
हालांकि, अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव ने इस रणनीति की अहमियत जरूर बढ़ा दी है। यदि भारत कई बड़े बाजारों में अपनी पहुंच मजबूत करता है, तो किसी एक देश द्वारा लगाए गए टैरिफ या व्यापार प्रतिबंध का असर अपेक्षाकृत कम किया जा सकता है। यही कारण है कि मौजूदा परिस्थितियों में भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ और बहुपक्षीय साझेदारी की नीति को अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
न्यूयॉर्क टाइम्स के विश्लेषण में क्या बात सामने आई?
भारत की विदेश नीति में आए इस बदलाव पर अमेरिकी मीडिया में भी चर्चा हुई है। न्यूयॉर्क टाइम्स के विश्लेषण में भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव और भारत द्वारा अन्य देशों के साथ संबंध मजबूत करने की दिशा पर ध्यान दिया गया है। हालांकि, इसे सीधे तौर पर भारत की पूरी विदेश नीति की ‘वाहवाही’ के रूप में पेश करना सावधानी मांगता है। किसी मीडिया रिपोर्ट में किसी रणनीति का विश्लेषण या उसके संभावित लाभों का उल्लेख और औपचारिक रूप से उसकी प्रशंसा करना अलग-अलग बातें हैं।
भारत के लिए मौजूदा रणनीति का वास्तविक परीक्षण आने वाले वर्षों में होगा। यदि नई व्यापार साझेदारियां भारतीय निर्यात, निवेश और रोजगार को बढ़ाती हैं और साथ ही ऊर्जा तथा रक्षा जरूरतों के लिए पर्याप्त विकल्प उपलब्ध कराती हैं, तो यह नीति आर्थिक और रणनीतिक रूप से भारत की स्थिति मजबूत कर सकती है। लेकिन कई देशों के साथ रिश्ते बनाए रखना अपने आप में आसान नहीं है, क्योंकि भारत को अमेरिका, रूस, चीन, यूरोप और पश्चिम एशिया जैसे अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बीच अपने राष्ट्रीय हितों का संतुलन लगातार बनाए रखना होगा।










