सहारनपुर: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद ने शनिवार को बड़ा मोड़ ले लिया। प्रशासन ने अदालत के आदेश के बाद कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद मस्जिद के ढांचे को बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया। कार्रवाई के दौरान मौके पर भारी पुलिस बल तैनात रहा और कलेक्ट्रेट परिसर में आवाजाही को भी नियंत्रित किया गया। प्रशासन का कहना है कि विवादित ढांचा सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण के रूप में पाया गया था और संबंधित न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसे हटाया गया।
अदालत के फैसले के बाद हुई कार्रवाई
मस्जिद को हटाने का विवाद अचानक सामने नहीं आया था। इस मामले में नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने 16 जुलाई 2026 को आदेश जारी किया था। अदालत ने विवादित परिसर को उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के तहत कार्रवाई योग्य माना था। आदेश में संबंधित ढांचे से बेदखली और क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया गया था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, विवादित निर्माण खसरा नंबर 539 की करीब 315 वर्ग मीटर जमीन से जुड़ा था।
जुलाई में आए आदेश के बाद मस्जिद कमेटी की ओर से इसे जिला अदालत में चुनौती दी गई। मस्जिद पक्ष का तर्क था कि जिस जमीन पर निर्माण मौजूद है, उसकी मिल्कियत को केवल खसरा रिकॉर्ड के आधार पर सरकारी जमीन नहीं माना जा सकता। पक्ष की ओर से पुराने राजस्व रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों का हवाला देते हुए जमीन के स्वामित्व पर सवाल उठाए गए।
6.41 करोड़ रुपये से अधिक की क्षतिपूर्ति का आदेश
नगर मजिस्ट्रेट के जुलाई के आदेश में केवल बेदखली ही नहीं, बल्कि करीब 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 565 रुपये की क्षतिपूर्ति का भी उल्लेख किया गया था। आदेश के तहत ढांचे को निर्धारित अवधि में हटाने के लिए समय दिया गया था और अनुपालन नहीं होने की स्थिति में प्रशासन को बलपूर्वक बेदखली की कार्रवाई का अधिकार दिया गया था।
इस आदेश के खिलाफ दाखिल अपील में मस्जिद पक्ष ने जमीन के स्वामित्व और सार्वजनिक परिसर कानून के इस्तेमाल पर सवाल उठाए थे। जिला अदालत ने हालांकि अपील को खारिज कर दिया और नगर मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा। उपलब्ध न्यायिक विवरण के मुताबिक, जिला जज सहारनपुर की अदालत ने 2 सितंबर 2026 को सिविल अपील संख्या 108/2026 को खारिज किया।
मस्जिद पक्ष का क्या दावा था?
मस्जिद पक्ष का कहना था कि विवादित जमीन का इतिहास सरकारी जमीन के रूप में देखने जितना सीधा नहीं है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी जुलाई में इस मामले पर प्रशासन के दावे को चुनौती देते हुए कहा था कि राजस्व रिकॉर्ड में जमीन पुराने जमींदारों के नाम से जुड़ी हुई है। उन्होंने जमीन के मालिकाना हक को लेकर पुराने दस्तावेजों और 1911 के बिजली बिल का भी हवाला दिया था।
मसूद का तर्क था कि खसरा नंबर से जमीन की स्थिति का पता चल सकता है, लेकिन मालिकाना हक का निर्धारण अलग राजस्व दस्तावेजों के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने इस मामले को लेकर आगे कानूनी लड़ाई लड़ने की बात भी कही है। शनिवार की कार्रवाई के बाद भी मसूद ने मामले को उच्च अदालत में ले जाने की घोषणा की।
शनिवार सुबह क्यों बढ़ाई गई सुरक्षा?
मस्जिद के ध्वस्तीकरण को लेकर प्रशासन पहले से सतर्क था। कार्रवाई के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर में एसडीएम, सिटी मजिस्ट्रेट और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की मौजूदगी रही। सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह ने कहा कि सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने निर्माण को सरकारी जमीन पर अवैध पाया था और मस्जिद कमेटी की पहली अपील खारिज होने के बाद मूल आदेश बरकरार रहा। इसके बाद उसी आदेश के अनुपालन में ढांचा हटाया गया।
पुलिस के अनुसार, इलाके में त्योहारों और संवेदनशील स्थिति को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा बल भी लगाया गया था। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कलेक्ट्रेट क्षेत्र में निगरानी बढ़ाई और अफवाहों को रोकने के लिए सोशल मीडिया गतिविधियों पर भी नजर रखी।
इकरा हसन को क्यों किया गया हाउस अरेस्ट?
मस्जिद पर कार्रवाई के बीच कैराना से समाजवादी पार्टी की लोकसभा सांसद इकरा हसन को उनके आवास पर रोक दिया गया। रिपोर्टों के मुताबिक वह शनिवार सुबह सहारनपुर जाने की तैयारी कर रही थीं। उनका उद्देश्य कलेक्ट्रेट मस्जिद मामले को लेकर अधिकारियों से मुलाकात करना और स्थानीय लोगों की चिंताओं को उठाना था। इससे पहले ही उनके कैराना स्थित आवास के बाहर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया और उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई।
इकरा हसन ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या किसी निर्वाचित सांसद के लिए अपने क्षेत्र से जुड़े मुद्दे पर अधिकारियों से मिलना अपराध हो गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोककर उनकी आवाज दबाने की कोशिश की गई। यह सांसद का राजनीतिक आरोप है; प्रशासन की ओर से इसे कानून-व्यवस्था और संभावित तनाव को देखते हुए उठाया गया निवारक कदम बताया गया है।
इमरान मसूद ने जताया विरोध
सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद लंबे समय से इस मामले को लेकर प्रशासन के फैसले का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने मस्जिद की जमीन के मालिकाना हक पर सवाल उठाते हुए कहा है कि मामला केवल निर्माण हटाने का नहीं, बल्कि जमीन के स्वामित्व और कानूनी प्रक्रिया का भी है। कार्रवाई के बाद उन्होंने उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट का रुख करने की बात कही है।
इससे पहले जुलाई में मसूद खुद विवादित मस्जिद परिसर पहुंचे थे और उन्होंने प्रशासन के फैसले को चुनौती देने की बात कही थी। उन्होंने यह भी दावा किया था कि कलेक्ट्रेट परिसर में अन्य धार्मिक ढांचा भी मौजूद है और कार्रवाई को लेकर समानता के सवाल उठते हैं। ये उनके राजनीतिक और कानूनी दावे हैं, जिनका अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया में होना बाकी है।
करीब 70 साल पुराना बताया जा रहा था ढांचा
मस्जिद को कई रिपोर्टों में करीब 70 साल पुराना बताया गया है, हालांकि इसके इतिहास और जमीन के स्वामित्व को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग रहे हैं। विवाद मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित रहा कि कलेक्ट्रेट परिसर की जमीन सरकारी है या पुराने राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर किसी अन्य पक्ष के अधिकार से जुड़ी है। प्रशासन ने सार्वजनिक परिसर कानून के तहत इसे अनधिकृत कब्जे का मामला माना, जबकि मस्जिद पक्ष ने इस निष्कर्ष को चुनौती दी।
अब आगे क्या होगा?
जिला अदालत से अपील खारिज होने और प्रशासन द्वारा ढांचा ध्वस्त किए जाने के बाद मामले का अगला महत्वपूर्ण चरण उच्च न्यायालय में संभावित चुनौती हो सकता है। इमरान मसूद ने उच्च अदालतों का रुख करने की बात कही है। ऐसे में जमीन के मालिकाना हक, पुराने राजस्व रिकॉर्ड, सार्वजनिक परिसर कानून के इस्तेमाल और प्रशासनिक कार्रवाई से जुड़े सवाल आगे भी कानूनी बहस का हिस्सा रह सकते हैं। फिलहाल प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई अदालत के आदेश के अनुपालन में की गई है। दूसरी ओर, मस्जिद पक्ष और विपक्षी नेताओं की ओर से जमीन के स्वामित्व तथा कार्रवाई की वैधता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसलिए मामले के सभी दावों को अंतिम तथ्य मानने के बजाय उन्हें संबंधित पक्षों के दावों और न्यायिक रिकॉर्ड के संदर्भ में देखना जरूरी है।










