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मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर अखिलेश यादव के पोस्टर से बवाल, ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ से गरमाई यूपी की सियासत

RK News by RK News
September 7, 2026
Reading Time: 1 min read
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मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर अखिलेश यादव के पोस्टर से बवाल, ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’ से गरमाई यूपी की सियासत

लखनऊ/सहारनपुर: मुजफ्फरनगर दंगों की 13वीं बरसी पर उत्तर प्रदेश में एक बार फिर 2013 की हिंसा को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। सोमवार, 7 सितंबर 2026 को प्रदेश के कई शहरों में ऐसे पोस्टर और होर्डिंग लगाए गए, जिन पर “न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे” जैसे संदेश लिखे थे। इन पोस्टरों में समाजवादी पार्टी के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तस्वीर भी इस्तेमाल की गई। पोस्टरों के सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया और पुलिस ने कई जगहों से इन्हें हटवा दिया।

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मामला इसलिए भी ज्यादा संवेदनशील हो गया है क्योंकि सहारनपुर में 5 सितंबर को कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद राजनीतिक तनाव पहले से बना हुआ है। इसी बीच समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और AIMIM समेत विपक्षी दलों के नेताओं का प्रतिनिधिमंडल सहारनपुर पहुंचने वाला था। प्रतिनिधिमंडल के दौरे से पहले अखिलेश यादव की तस्वीर वाले दंगों से जुड़े पोस्टर सामने आने को लेकर राजनीतिक संदेश और उसके मकसद पर चर्चा शुरू हो गई है।

सहारनपुर में कहां लगे पोस्टर?

रिपोर्टों के मुताबिक सहारनपुर शहर में बड़े अस्पताल पुल समेत कुछ प्रमुख स्थानों पर ऐसे पोस्टर लगाए गए थे। पोस्टर में 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों से जुड़ी तस्वीरों और घटनाक्रम का इस्तेमाल किया गया था। इसके निचले हिस्से में अखिलेश यादव की तस्वीर लगाई गई और ऊपर “न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे” जैसे शब्द लिखे गए।

पोस्टर सामने आने की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और उन्हें हटवा दिया। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि पोस्टर किसने लगाए, किस उद्देश्य से लगाए गए और इनके पीछे किसी संगठन या व्यक्ति की भूमिका है या नहीं। इसके लिए आसपास के CCTV कैमरों की फुटेज और अन्य साक्ष्यों की जांच की जा रही है।

लखनऊ में भी अखिलेश यादव को निशाना बनाने वाला पोस्टर

विवाद केवल सहारनपुर तक सीमित नहीं रहा। राजधानी लखनऊ के गोमती नगर इलाके के विपुल खंड-4 स्थित CMS चौराहे पर भी एक पोस्टर सामने आया। इसमें अखिलेश यादव की तस्वीर का इस्तेमाल करते हुए 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों का उल्लेख किया गया था। पोस्टर पर भी “न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे” का संदेश लिखा था।

NDTV/IANS के मुताबिक लखनऊ वाले पोस्टर में अखिलेश यादव को एक लड़की का डांस देखते हुए दिखाया गया था। पोस्टर में 7 सितंबर और मुजफ्फरनगर दंगों का उल्लेख भी किया गया था। इस पोस्टर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हुई।

मुजफ्फरनगर के अलावा इन शहरों में भी लगे होर्डिंग

ABP की रिपोर्ट के अनुसार मुजफ्फरनगर, लखनऊ, अलीगढ़, सहारनपुर और शामली समेत कई शहरों में इस तरह के पोस्टर या होर्डिंग लगाए गए। मुजफ्फरनगर में रोडवेज बस स्टैंड समेत कुछ प्रमुख स्थानों पर भी ऐसी सामग्री लगाए जाने की बात सामने आई है।

हालांकि, अभी तक किसी विश्वसनीय आधिकारिक स्रोत से यह पुष्टि नहीं हुई है कि इन पोस्टरों के पीछे कौन-सा संगठन या राजनीतिक दल है। इसलिए पोस्टरों को सीधे किसी पार्टी का आधिकारिक अभियान बताना जल्दबाजी होगी।

2013 के मुजफ्फरनगर दंगे क्यों बने फिर राजनीतिक मुद्दा?

मुजफ्फरनगर और आसपास के पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सितंबर 2013 में भड़की सांप्रदायिक हिंसा को राज्य के सबसे गंभीर दंगों में गिना जाता है। हिंसा और उसके बाद की घटनाओं में 60 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए थे। अलग-अलग रिपोर्टों और सरकारी आंकड़ों में विस्थापित लोगों की संख्या 40 हजार से लेकर 50 हजार से अधिक तक बताई गई है।

उस समय उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार थी। हिंसा को रोकने, कानून-व्यवस्था संभालने और दंगा प्रभावित लोगों को पर्याप्त राहत देने को लेकर तत्कालीन सरकार को विपक्ष की आलोचना का सामना करना पड़ा था। वहीं समाजवादी पार्टी ने सरकार पर लगाए गए कई राजनीतिक आरोपों को खारिज किया था।

अखिलेश यादव की तस्वीर लगाने का राजनीतिक संदेश क्या?

पोस्टरों में अखिलेश यादव की तस्वीर के इस्तेमाल ने इस पूरे मामले को सीधे मौजूदा यूपी की राजनीति से जोड़ दिया है। 2013 के दंगों के समय अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे, इसलिए उनके विरोधी उस दौर की कानून-व्यवस्था और सरकार की भूमिका को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।

दूसरी ओर, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि पोस्टर किसी व्यक्ति या संगठन द्वारा लगाए गए राजनीतिक संदेश हैं। इन्हें किसी न्यायिक निष्कर्ष या आधिकारिक जांच की रिपोर्ट के रूप में पेश नहीं किया जा सकता। पोस्टर में लगाए गए राजनीतिक आरोपों की जिम्मेदारी भी फिलहाल स्पष्ट नहीं है।

सहारनपुर मस्जिद विवाद से जुड़ा नया राजनीतिक तनाव

पोस्टर विवाद ऐसे समय सामने आया है जब सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद के ध्वस्तीकरण को लेकर यूपी की राजनीति गरमाई हुई है। 5 सितंबर को हुई कार्रवाई के बाद विपक्षी दलों ने प्रशासन से जवाब मांगने और घटनास्थल का दौरा करने की बात कही है। सोमवार को विपक्षी नेताओं के सहारनपुर दौरे से पहले कई नेताओं को रोके जाने या नजरबंद किए जाने की खबरें भी सामने आईं। अमर उजाला के अनुसार सरधना विधायक अतुल प्रधान को हाउस अरेस्ट किया गया, जबकि समाजवादी पार्टी के सांसद हरेंद्र मलिक को उनके मुजफ्फरनगर स्थित आवास पर नजरबंद किया गया। दोनों को सहारनपुर जाने वाले विपक्षी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा होना था।

ऐसे माहौल में मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर अखिलेश यादव की तस्वीर वाले पोस्टरों ने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया है।

पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल- पोस्टर किसने लगाए?

फिलहाल पुलिस की जांच का सबसे अहम सवाल यही है कि इन पोस्टरों को किसने तैयार कराया और किसने सार्वजनिक स्थानों पर लगाया। पुलिस आसपास के CCTV फुटेज और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पोस्टर लगाने वालों की पहचान करने में जुटी है। अगर जांच में यह सामने आता है कि पोस्टरों के जरिए किसी समुदाय के खिलाफ भड़काऊ संदेश या कानून-व्यवस्था प्रभावित करने की कोशिश की गई, तो प्रशासन आगे की कार्रवाई पर फैसला ले सकता है। हालांकि, इस संबंध में पुलिस की ओर से अभी किसी आरोपी या संगठन का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया है।

13 साल बाद भी मुजफ्फरनगर दंगे यूपी की राजनीति में क्यों महत्वपूर्ण?

मुजफ्फरनगर दंगे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर लंबे समय तक असर डालने वाली घटनाओं में रहे हैं। दंगों के बाद क्षेत्र में सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण की चर्चा हुई और चुनावी राजनीति में भी इसका प्रभाव देखा गया। यही वजह है कि हर बरसी के आसपास 2013 की घटनाएं फिर राजनीतिक विमर्श में लौट आती हैं।

इस बार भी मामला केवल बरसी तक सीमित नहीं रहा। सहारनपुर मस्जिद विवाद, विपक्षी नेताओं के प्रस्तावित दौरे और अखिलेश यादव की तस्वीर वाले पोस्टरों के एक साथ सामने आने से इस पूरे घटनाक्रम ने मौजूदा यूपी राजनीति का रूप ले लिया है।

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