सहारनपुर: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद सामने आई कुएं जैसी पुरानी संरचना को लेकर पुरातात्विक जांच तेज हो गई है। मलबा हटाने के दौरान सामने आई इस संरचना का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और उत्तर प्रदेश के राज्य पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने निरीक्षण किया। शुरुआती जांच में संरचना करीब 20 फीट गहरी और लगभग 3 फीट व्यास की पाई गई है। अधिकारियों के मुताबिक, इसे बनाने में लखौरी ईंटों का इस्तेमाल हुआ है और ईंटों को जोड़ने के लिए चूना-सुर्खी मोर्टार का इस्तेमाल किया गया है।
ASI को जांच में क्या मिला?
पुरातत्व विभाग के सहायक अधिकारी मनोज कुमार यादव के अनुसार, शुरुआती निरीक्षण में यह संरचना एक कुएं जैसी दिखाई देती है। इसमें इस्तेमाल हुई लखौरी ईंटें पतली और छोटी आकार की पकी हुई ईंटें हैं, जिनका इस्तेमाल उत्तर भारत में पुराने दौर की इमारतों में किया जाता था। संरचना की दीवारों में चूना-सुर्खी का मजबूत मसाला दिखाई दिया, जबकि ऊपरी हिस्से में चूने का प्लास्टर भी मिला है।
निरीक्षण में यह भी सामने आया कि जमीन की मौजूदा सतह से नीचे मिट्टी की परतें जमा हैं। संरचना के एक हिस्से में ईंटों को विशेष आकार देकर गोलाकार ढंग से लगाया गया है। हालांकि कुएं के भीतर काफी मलबा भरा हुआ है, इसलिए इसके सबसे निचले हिस्से में क्या मौजूद है, यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है।
कितना पुराना है यह कुआं?
इस संरचना की उम्र को लेकर अभी अंतिम आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। राज्य पुरातत्व विभाग के अधिकारी ने इसके निर्माण में इस्तेमाल तकनीक और लखौरी ईंटों के आधार पर इसे पुराने मध्यकालीन स्थापत्य से जोड़कर देखने की बात कही है। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारी ने शुरुआती तौर पर इसके करीब 200 से 250 साल पुराना होने की संभावना जताई है। हालांकि विस्तृत वैज्ञानिक जांच के बाद ही इसकी सही उम्र निर्धारित की जा सकेगी।
क्या ASI को मंदिर के अवशेष मिले हैं?
फिलहाल ऐसा कहना सही नहीं होगा। ASI की शुरुआती जांच में किसी मंदिर के अवशेष मिलने की पुष्टि नहीं हुई है। अभी जो सामने आया है, वह लखौरी ईंटों से बनी कुएं जैसी संरचना है। इसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जाता था और इसका तत्कालीन धार्मिक या नागरिक ढांचे से क्या संबंध था, यह जांच का विषय है। अधिकारियों ने संरचना की प्राचीनता, प्रकृति और ऐतिहासिक संदर्भ को समझने के लिए आगे अध्ययन की जरूरत बताई है।
मलबे के नीचे कैसे मिला कुआं?
मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद जब मलबा हटाया जा रहा था, तब कर्मचारियों को जमीन के नीचे एक स्लैब दिखाई दिया। अधिकारियों के अनुसार, स्लैब को काटकर हटाने के बाद उसके नीचे यह कुएं जैसी संरचना सामने आई। इसके बाद सहारनपुर के एसडीएम ने ASI को सूचना दी, ताकि इसकी प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व की जांच कराई जा सके। फिलहाल संरचना को लोहे की चादर से ढक दिया गया है और मौके पर सुरक्षा व्यवस्था भी की गई है।
मस्जिद ध्वस्तीकरण से क्या है पूरा मामला?
यह संरचना उसी स्थान पर मिली है जहां सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को प्रशासन ने हाल ही में ध्वस्त किया था। प्रशासन के मुताबिक, यह निर्माण सरकारी जमीन पर अनधिकृत था और कार्रवाई अदालत की प्रक्रिया के बाद की गई। मस्जिद प्रबंधन ने इस कार्रवाई का विरोध किया था और मामले को अदालत में चुनौती दी थी।
मस्जिद प्रबंधन ने अदालत में एक 1 जनवरी 1911 का बिजली बिल भी पेश किया था और इसके आधार पर दावा किया था कि मस्जिद का अस्तित्व एक सदी से अधिक पुराना है। अधिकारियों ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि सहारनपुर में बिजली की शुरुआत 1912 में हुई थी। इस दावे और दस्तावेज की प्रामाणिकता का विवाद अलग कानूनी विषय है और इसे कुएं की उम्र का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
अब ASI की जांच में क्या पता चलेगा?
अब जांच का मुख्य सवाल यह है कि यह संरचना वास्तव में कितनी पुरानी है, इसका मूल उद्देश्य क्या था और इसे किस ऐतिहासिक दौर में बनाया गया था। इसके लिए निर्माण शैली, ईंटों, मोर्टार, प्लास्टर और उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड का अध्ययन किया जा रहा है। कुएं के अंदर मौजूद मलबा हटाने और आगे की वैज्ञानिक जांच के बाद ही इसके बारे में ज्यादा ठोस जानकारी सामने आ सकती है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मस्जिद के नीचे मिली यह संरचना पुरानी निर्माण तकनीक से जुड़ी हुई है, लेकिन इसे मंदिर, मस्जिद या किसी अन्य धार्मिक स्थल से जोड़ने वाला कोई आधिकारिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है। ASI की विस्तृत जांच के बाद ही इसके इतिहास और महत्व पर अंतिम तस्वीर साफ होगी।










