नई दिल्ली: दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR और उनके भविष्य पर पड़ने वाले असर को लेकर गंभीर चिंता जताई है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने वाले छात्रों और गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोगों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने संकेत दिया कि जिन मामलों में केवल छात्र आरोपी हैं, उनमें संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत FIR रद्द करने पर विचार किया जा सकता है।
यह मामला 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर और उसके आसपास हुए छात्र प्रदर्शन से जुड़ा है। प्रदर्शनकारी शिक्षा व्यवस्था और NEET पेपर लीक समेत कई मुद्दों को लेकर विरोध कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई, कथित बल प्रयोग, हिरासत और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई हैं।
‘छात्रों का भविष्य दांव पर’, CJI ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी छात्र का भविष्य केवल इस वजह से प्रभावित नहीं होना चाहिए कि वह किसी प्रदर्शन में शामिल हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर के अनुसार, CJI ने कहा कि आपराधिकता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि छात्र किसी ऐसे प्रदर्शन में शामिल था जिसे गैरकानूनी बताया गया है। प्रदर्शन में शामिल होने के उद्देश्य और परिस्थितियों को भी देखना होगा।
CJI ने यह भी कहा कि छात्रों को व्यवस्था से कुछ वैध अपेक्षाएं होती हैं और अदालत को उनके जीवन तथा भविष्य पर पड़ने वाले असर को ध्यान में रखना होगा। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हत्या, बलात्कार, अपहरण और POCSO जैसे गंभीर अपराधों के आरोपों वाले मामलों को सामान्य छात्र मामलों के साथ नहीं जोड़ा जाएगा।
केवल छात्रों वाली FIR पर क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
सुनवाई में छात्रों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग दोहराई। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि या गंभीर अपराधों से जुड़े लोगों के मामलों को अलग रखा जाना चाहिए।
इस पर CJI सूर्यकांत ने संकेत दिया कि जिन FIR में केवल छात्र शामिल हैं, उन्हें अनुच्छेद 142 के तहत समाप्त करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जिन लोगों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखने की बात कही जा रही है, उनकी पहचान स्पष्ट होनी चाहिए। केवल ‘अवांछित तत्व’ जैसी सामान्य श्रेणी बनाकर कार्रवाई नहीं की जा सकती।
जंतर-मंतर प्रदर्शन में पुलिस कार्रवाई पर भी सवाल
जंतर-मंतर प्रदर्शन को लेकर दाखिल याचिकाओं में प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने के आरोप लगाए हैं। इनमें लाठीचार्ज, आंसू गैस, हिरासत और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार जैसे आरोप शामिल हैं। हालांकि ये आरोप याचिकाकर्ताओं के दावे हैं और इन पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी नहीं आया है।
इससे पहले जुलाई में CJI सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि शांतिपूर्ण और कानूनी प्रदर्शन संविधान के तहत संरक्षित है तथा केवल प्रदर्शन या आंदोलन होने के आधार पर लाठीचार्ज को उचित नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र जांच की जरूरत पर भी जोर दिया था।
पुलिस कार्रवाई की जांच के लिए हाई-पावर्ड कमेटी पर विचार
सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़े पुलिस कार्रवाई के आरोपों की जांच के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी गठित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाया है। अदालत ने एक पूर्व CBI निदेशक और दूसरे राज्य के पूर्व DGP जैसे अधिकारियों को समिति में शामिल करने पर विचार किया है।
इस समिति के सामने पुलिस कार्रवाई, कथित यौन हिंसा, प्रदर्शनकारियों के साथ दुर्व्यवहार और अन्य शिकायतों को रखा जा सकता है। अदालत ने कहा है कि जिन मामलों में तत्काल ध्यान देने की जरूरत है, उन्हें भी समिति के सामने रखा जा सकेगा।
फेस रिकग्निशन तकनीक का मुद्दा भी उठा
जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर इस्तेमाल की गई फेस रिकग्निशन तकनीक का मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट के सामने उठा। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि प्रदर्शनकारियों के चेहरों की पहचान और डेटा प्रोसेसिंग से निजता तथा संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़े सवाल पैदा होते हैं।
सरकार की ओर से कहा गया कि तकनीक से मिले संभावित मैच को अपने आप कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जाता और उसके बाद फील्ड वेरिफिकेशन किया जाता है। कोर्ट ने संकेत दिया कि इस तकनीक से जुड़े व्यापक संवैधानिक सवालों पर आगे विचार किया जाएगा।
गंभीर अपराधों के आरोपी छात्रों से अलग क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सभी प्रदर्शनकारियों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। जिन मामलों में केवल प्रदर्शन में भाग लेने वाले छात्रों के खिलाफ मामूली या सामान्य आरोप हैं, उन्हें गंभीर अपराधों के आरोपियों से अलग करके देखा जाना चाहिए। वहीं हत्या, बलात्कार, अपहरण और POCSO जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों की जांच जारी रह सकती है।
यही अंतर इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट के रुख का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अदालत एक तरफ छात्रों के भविष्य को लेकर चिंता जता रही है, वहीं दूसरी तरफ गंभीर अपराधों के आरोपों को केवल ‘छात्र प्रदर्शन’ के नाम पर खत्म करने के पक्ष में नहीं है।











