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‘बुलडोजर बदले की राजनीति का हथियार बन रहे हैं’, सहारनपुर में ढहाई गई मस्जिद पर मौलाना अरशद मदनी ने उठाए सवाल

RK News by RK News
September 6, 2026
Reading Time: 1 min read
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‘बुलडोजर बदले की राजनीति का हथियार बन रहे हैं’, सहारनपुर में ढहाई गई मस्जिद पर मौलाना अरशद मदनी ने उठाए सवाल

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को ध्वस्त किए जाने के बाद इस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। अब जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी ने भी ध्वस्तीकरण पर कड़ी नाराजगी जताई है। मदनी ने कहा कि बुलडोजर का इस्तेमाल अब सिर्फ कानून लागू करने के लिए नहीं, बल्कि “बदले, पूर्वाग्रह और नफरत की राजनीति” के साधन के रूप में होता दिखाई दे रहा है। उन्होंने सहारनपुर की घटना को बेहद अफसोसनाक बताते हुए इसे संविधान, कानून के शासन, धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य की निष्पक्षता से जुड़े व्यापक सवालों से जोड़ दिया।

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‘बुलडोजर न्याय का प्रतीक कम, बदले का हथियार ज्यादा’

अरशद मदनी ने शनिवार को अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि अवैध संपत्तियों को गिराने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बुलडोजर धीरे-धीरे न्याय के प्रतीक के बजाय बदले, पूर्वाग्रह और नफरत की राजनीति के उपकरण बनते जा रहे हैं। उन्होंने सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को गिराए जाने पर गहरा दुख और विरोध जताया।

मदनी के मुताबिक, यह मामला केवल किसी एक मस्जिद के ढांचे को हटाए जाने तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार इससे यह सवाल उठता है कि देश में संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिकों की समानता को व्यवहार में किस तरह लागू किया जा रहा है। उन्होंने राज्य की भूमिका को सभी धर्मों के प्रति समान और निष्पक्ष रहने की जरूरत पर जोर दिया।

मदनी ने उठाया समान कानून लागू होने का सवाल

जमीयत अध्यक्ष ने सवाल उठाया कि अगर संविधान सभी नागरिकों को समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है, तो अलग-अलग धार्मिक समुदायों से जुड़े मामलों में कानून के इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग मानक क्यों दिखाई देते हैं।

हालांकि, यह अरशद मदनी की राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया है। प्रशासन का पक्ष अलग है। अधिकारियों के अनुसार सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद ढांचा सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण पाया गया था और इसे हटाने की कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया के बाद की गई। इसलिए ध्वस्तीकरण की वैधता और उसके पीछे किसी राजनीतिक उद्देश्य के आरोपों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

क्या है सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद विवाद?

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को लेकर विवाद 2025 में औपचारिक कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचा था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, बजरंग दल के पूर्व प्रांतीय संयोजक विकास त्यागी की शिकायत के बाद राजस्व विभाग की जांच हुई। इसके बाद 24 मार्च 2025 को उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के तहत सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में कार्रवाई शुरू हुई।

रिपोर्टों के मुताबिक, मार्च 2025 में एक राजस्व अधिकारी ने मस्जिद के कथित प्रबंधक अब्दुल हमीद के खिलाफ सरकारी संपत्ति पर अनधिकृत कब्जे को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी। अप्रैल 2025 में नोटिस जारी किए गए और जून में संबंधित पक्षों की ओर से आपत्तियां दाखिल की गईं।

सिटी मजिस्ट्रेट ने जुलाई में क्या फैसला दिया?

16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने विवादित ढांचे को सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण मानते हुए बेदखली का आदेश दिया। रिपोर्टों के अनुसार विवादित जमीन का क्षेत्रफल करीब 315 वर्ग मीटर था। इसी आदेश में करीब 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति/जुर्माने का भी उल्लेख किया गया। प्रशासन का कहना था कि सार्वजनिक परिसर की जमीन पर अनधिकृत कब्जा था।

मस्जिद प्रबंधन ने इस आदेश को चुनौती देते हुए जिला जज की अदालत का रुख किया। इसके बाद मामले में कई तारीखों पर सुनवाई हुई।

जिला अदालत ने अपील खारिज की

मामले में जिला जज की अदालत ने 2 सितंबर 2026 को मस्जिद प्रबंधन की अपील खारिज कर दी और सिटी मजिस्ट्रेट के जुलाई के आदेश को बरकरार रखा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, मामले में कुल 17 तारीखों पर सुनवाई हुई थी। इसके बाद प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई आगे बढ़ाई।

इंडियन एक्सप्रेस की कानूनी रिपोर्ट के मुताबिक, जिला अदालत के फैसले में अलग से “मस्जिद गिराने” का आदेश नहीं था, लेकिन जुलाई के बेदखली आदेश को बरकरार रखे जाने के बाद प्रशासन ने ढांचे को हटा दिया।

5 सितंबर की सुबह बुलडोजर कार्रवाई

शनिवार, 5 सितंबर 2026 की सुबह सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में भारी सुरक्षा के बीच ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू हुई। प्रशासन ने कलेक्ट्रेट के पांचों प्रवेश द्वार बंद कर दिए थे और बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी। मौके पर स्थानीय पुलिस के अलावा अतिरिक्त बल और रैपिड एक्शन फोर्स की तैनाती की गई।

रिपोर्टों के अनुसार, जेसीबी मशीनें, डंपर और अन्य उपकरण रात में ही कलेक्ट्रेट परिसर में पहुंचा दिए गए थे। सुबह अधिकारियों की मौजूदगी में मस्जिद के ढांचे को हटाया गया। सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह ने कहा कि सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने निर्माण को सरकारी जमीन पर अवैध पाया था और मस्जिद कमेटी की अपील खारिज होने के बाद प्रशासन ने कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की।

मस्जिद पक्ष ने क्या कहा?

मस्जिद के मुतवल्ली तनवीर अहमद ने प्रशासन के दावे पर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार मस्जिद काफी पुरानी है और उन्होंने इसकी उम्र करीब 150 साल बताई है। मस्जिद पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि ध्वस्तीकरण के दौरान उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। हालांकि प्रशासन और अदालत के रिकॉर्ड में विवादित ढांचे को सरकारी जमीन पर अनधिकृत निर्माण माना गया है। जमीन के स्वामित्व और मस्जिद की ऐतिहासिक स्थिति को लेकर मस्जिद पक्ष के दावों पर आगे की कानूनी प्रक्रिया में फैसला हो सकता है।

इकरा हसन को हाउस अरेस्ट किए जाने का दावा

ध्वस्तीकरण के बीच कैराना से समाजवादी पार्टी की लोकसभा सांसद इकरा हसन ने दावा किया कि उन्हें उनके आवास पर हाउस अरेस्ट किया गया ताकि वह सहारनपुर जाकर अधिकारियों से मुलाकात न कर सकें। उनके आवास के बाहर रात से ही बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात था।

इकरा हसन के मुताबिक वह सहारनपुर जाकर कलेक्ट्रेट मस्जिद मामले को लेकर अधिकारियों से बात करना चाहती थीं और स्थानीय लोगों की चिंताओं को सामने रखना चाहती थीं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को अपने क्षेत्र से जुड़े मामले में अधिकारियों से मिलने से रोकना उचित है। यह उनका आरोप है; प्रशासन ने सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के मद्देनजर कार्रवाई की बात कही है।

विपक्ष ने भी कार्रवाई पर सवाल उठाए

सहारनपुर मस्जिद ध्वस्तीकरण के बाद विपक्षी दलों की ओर से भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने कार्रवाई की टाइमिंग और तरीके पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने इसे सहारनपुर के लिए “ब्लैक डे” बताया, जबकि समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने न्यायिक प्रक्रिया के अगले विकल्पों के बीच जल्दबाजी में कार्रवाई की।

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सामाजिक सौहार्द बनाए रखने को सरकार की प्रमुख जिम्मेदारी बताया। दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई अदालत में चुनौती दिए गए आदेश के बरकरार रहने के बाद की गई और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई थी।

अरशद मदनी के बयान का बड़ा राजनीतिक संदर्भ

अरशद मदनी का बयान ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश में धार्मिक ढांचों से जुड़े प्रशासनिक और कानूनी विवाद पहले से राजनीतिक बहस का विषय हैं। बुलडोजर कार्रवाई को लेकर समर्थक इसे सरकारी जमीन और अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई बताते हैं, जबकि आलोचक आरोप लगाते हैं कि बुलडोजर का इस्तेमाल चुनिंदा मामलों में राजनीतिक या धार्मिक पक्षपात के साथ किया जाता है।

सहारनपुर मामले में उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, प्रशासन की कार्रवाई की तत्काल कानूनी पृष्ठभूमि सरकारी जमीन पर कथित अनधिकृत कब्जे और सार्वजनिक परिसर कानून के तहत बेदखली आदेश है। इसलिए मदनी द्वारा लगाए गए “बदले की राजनीति” के आरोप को प्रशासन के कानूनी पक्ष से अलग रखते हुए देखना जरूरी है।

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