नई दिल्ली: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने देश की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था को लेकर चल रही बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। शनिवार को उनके पद छोड़ने के साथ ही यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक दिन पहले तक सरकार अपने वरिष्ठ मंत्री के पीछे मजबूती से खड़ी दिखाई दे रही थी और महज 24 घंटे के भीतर स्थिति पूरी तरह बदल गई।
पिछले कई सप्ताह से NEET-UG पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं और छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन चल रहे थे। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन गया। जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग तक पहुंचे इस आंदोलन ने न केवल सरकार को असहज किया, बल्कि विपक्ष को भी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा दे दिया।
सूत्रों के अनुसार, निर्णायक मोड़ शुक्रवार को केंद्र सरकार और CJP के बीच हुई दूसरी दौर की बातचीत में आया। इस बैठक में CJP के प्रतिनिधियों ने कथित तौर पर सरकार को स्पष्ट संदेश दिया कि उनकी प्राथमिक और अंतिम मांग केवल एक है—धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। बातचीत से जुड़े सूत्रों का दावा है कि छात्र नेताओं ने सरकार को 72 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए कहा था कि यदि शिक्षा मंत्री को नहीं हटाया गया, तो 20 जुलाई के “संसद मार्च” से भी बड़ा प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा।
सरकार के लिए चिंता का विषय केवल आंदोलन का बढ़ता आकार नहीं था, बल्कि उसका बदलता स्वरूप भी था। सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल, विपक्षी दलों का समर्थन, देशभर में छात्रों के प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर लगातार बढ़ता दबाव, इन सबने मिलकर इस मुद्दे को राष्ट्रीय संकट का रूप दे दिया था। सरकार के भीतर यह आशंका भी जताई जा रही थी कि यदि आंदोलन और लंबा खिंचता है, तो इसका असर संसद के मानसून सत्र और कई राज्यों के राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है।
सूत्रों का यह भी कहना है कि शुक्रवार देर रात तक सरकार के शीर्ष स्तर पर कई दौर की चर्चा हुई। एक पक्ष का मानना था कि मंत्री का इस्तीफा सरकार की कमजोरी के रूप में देखा जाएगा, जबकि दूसरा पक्ष यह तर्क दे रहा था कि एक व्यक्ति की जगह पूरे शिक्षा तंत्र और सरकार की साख को बचाना अधिक महत्वपूर्ण है। अंततः दूसरा पक्ष भारी पड़ा और शनिवार सुबह धर्मेंद्र प्रधान ने अपना इस्तीफा सौंप दिया।
हालांकि, सरकार की ओर से आधिकारिक तौर पर यह नहीं कहा गया है कि इस्तीफा CJP के दबाव में लिया गया निर्णय था। सरकार के सूत्र इसे “व्यापक शिक्षा सुधारों के लिए नई शुरुआत” के रूप में पेश कर रहे हैं। वहीं, CJP और छात्र संगठनों ने इसे युवाओं की ऐतिहासिक जीत करार दिया है।












