नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने असम में नागरिकता से जुड़े मामलों पर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक या विदेशी घोषित करने की प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और न्यायसंगत होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि केवल तकनीकी आधारों पर किसी को विदेशी घोषित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने गौहाटी हाईकोर्ट और विदेशी ट्रिब्यूनलों के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें कुछ लोगों को विदेशी घोषित किया गया था। अदालत ने निर्देश दिया कि संबंधित मामलों की दोबारा सुनवाई की जाए और तब तक इन लोगों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक या जबरन कार्रवाई न की जाए।
टाइपिंग और वर्तनी की गलतियों पर उठे सवाल
सबीत्री डे, अजबहार अली, मोहम्मद अकबर अली, आबेदा खातून और अनोवारा खातून ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि उन्हें पुराने मतदाता रिकॉर्ड में नाम की वर्तनी या मामूली त्रुटियों के आधार पर विदेशी घोषित कर दिया गया। उनका आरोप था कि ऐसे तकनीकी कारणों के चलते उनकी नागरिकता पर सवाल उठाया गया, जो न्यायसंगत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने याचिकाकर्ताओं की नागरिकता पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। अदालत ने केवल यह कहा कि विदेशी घोषित करने की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून के अनुरूप होनी चाहिए। इसलिए मामलों को दोबारा संबंधित ट्रिब्यूनलों के पास भेजा गया है, ताकि सभी पक्षों को उचित अवसर देकर नए सिरे से सुनवाई की जा सके।
दोबारा होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब विदेशी ट्रिब्यूनल इन मामलों की फिर से सुनवाई करेंगे। इस दौरान याचिकाकर्ताओं के खिलाफ किसी भी तरह की जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी। अदालत ने कहा कि नागरिकता जैसे संवेदनशील मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना बेहद आवश्यक है।









