नई दिल्ली: ज़ी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा से जुड़े पर्सनल गारंटी और दिवालियापन मामले में अब कानूनी लड़ाई और तेज होती दिख रही है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) द्वारा करीब ₹22,006.57 करोड़ के admitted creditor claims के मुकाबले लगभग ₹6.5 करोड़ के repayment plan को मंजूरी दिए जाने के बाद HDFC Bank ने इस फैसले को चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। बैंक ने कहा है कि वह नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के सामने अपील दायर करने के विकल्प पर विचार कर रहा है।
NCLT ने किस repayment plan को मंजूरी दी?
NCLT ने सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत insolvency proceedings में पेश किए गए repayment plan को मंजूरी दी है। इस योजना के तहत लेनदारों को लगभग ₹6.5 करोड़ की राशि उपलब्ध होगी, जबकि सुभाष चंद्रा से जुड़े admitted claims का कुल मूल्य करीब ₹22,006.57 करोड़ है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, इस रकम में लगभग ₹6.25 करोड़ लेनदारों के भुगतान के लिए और करीब ₹25 लाख insolvency process की लागत के लिए निर्धारित हैं।
इन आंकड़ों को सीधे तौर पर ₹22,000 करोड़ के बैंक कर्ज की माफी के रूप में देखना सही नहीं होगा। मामला मुख्य रूप से उन ऋणों से जुड़ी व्यक्तिगत गारंटियों का है, जिन्हें सुभाष चंद्रा ने अपने कारोबारी समूह की कंपनियों के लिए दिया था। इसलिए NCLT का आदेश सुभाष चंद्रा द्वारा व्यक्तिगत रूप से ₹22,006 करोड़ उधार लेने और फिर सिर्फ ₹6.5 करोड़ चुकाने का मामला नहीं है।
HDFC Bank ने योजना का किया था विरोध
HDFC Bank इस repayment plan से सहमत नहीं था। बैंक ने resolution पर मतदान के दौरान इसके खिलाफ वोट किया था और अब उसका कहना है कि NCLT के आदेश के खिलाफ कानूनी विकल्पों की समीक्षा की जा रही है। बैंक की आपत्ति मुख्य रूप से लेनदारों के लिए प्रस्तावित बेहद कम recovery को लेकर है। रिपोर्टों के मुताबिक, योजना के तहत कुल admitted claims की तुलना में recovery करीब 0.03% बैठती है, यानी लगभग 99.97% का haircut दिखाई देता है।
HDFC Bank के अलावा दूसरे वित्तीय संस्थानों और बैंकों ने भी इस फैसले पर आपत्ति जताई है। Union Bank of India, Canara Bank और LIC Housing Finance समेत कुछ अन्य लेनदार NCLT के आदेश को चुनौती देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि repayment plan को लेकर creditor community के भीतर व्यापक असहमति है।
क्यों महत्वपूर्ण है ₹22,006 करोड़ बनाम ₹6.5 करोड़ का अंतर?
इस मामले का सबसे बड़ा विवाद इसी भारी अंतर को लेकर है। एक तरफ लेनदारों के admitted claims ₹22,006.57 करोड़ बताए गए हैं, जबकि repayment plan में उपलब्ध भुगतान लगभग ₹6.5 करोड़ है। इस अंतर के कारण recovery percentage बेहद कम हो जाती है और बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थानों के हितों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
हालांकि, insolvency proceedings में व्यक्तिगत गारंटर की देनदारी और मूल कॉरपोरेट उधारकर्ता की देनदारी को अलग-अलग समझना जरूरी है। सुभाष चंद्रा का पक्ष यह रहा है कि उन्होंने मुख्य रूप से कंपनियों के ऋणों के लिए व्यक्तिगत गारंटी दी थी। इसी वजह से इस मामले में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि व्यक्तिगत insolvency प्रक्रिया के तहत उनकी अपनी उपलब्ध संपत्तियों और भुगतान क्षमता से लेनदारों को कितना पैसा वास्तव में मिल सकता है।
बहुमत से मंजूर हुआ था प्रस्ताव
NCLT के सामने repayment plan को लेनदारों के एक वर्ग के विरोध के बावजूद बहुमत का समर्थन मिला था। इसी आधार पर योजना को मंजूरी मिली। HDFC Bank ने हालांकि इसका विरोध किया और मतदान में इसके खिलाफ अपनी स्थिति दर्ज कराई। अब बैंक के सामने अगला विकल्प NCLAT में अपील करना है, जहां वह NCLT के आदेश और repayment plan की मंजूरी को चुनौती दे सकता है।
सुभाष चंद्रा के लिए क्या मायने रखता है NCLT का फैसला?
NCLT की मंजूरी सुभाष चंद्रा के लिए व्यक्तिगत insolvency proceedings में एक महत्वपूर्ण राहत के तौर पर देखी जा रही है, क्योंकि इससे उनके खिलाफ चल रही प्रक्रिया में प्रस्तावित repayment arrangement को न्यायिक स्वीकृति मिली है। हालांकि, यदि HDFC Bank और अन्य लेनदार NCLAT का रुख करते हैं, तो विवाद अभी समाप्त नहीं माना जा सकता। अपीलीय कार्यवाही में repayment plan की वैधता, creditors के हित और NCLT के फैसले की समीक्षा जैसे मुद्दे सामने आ सकते हैं।
बैंकों के लिए आगे की लड़ाई क्यों अहम है?
HDFC Bank और अन्य विरोध करने वाले लेनदारों के लिए यह मामला केवल सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत insolvency तक सीमित नहीं है। व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े मामलों में recovery किस तरह निर्धारित की जाती है और guarantor की उपलब्ध संपत्तियों के आधार पर creditors को कितना भुगतान मिल सकता है, इस पर भी इस मामले का व्यापक असर पड़ सकता है। यही वजह है कि बड़े वित्तीय संस्थान NCLT के आदेश को चुनौती देने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं।
अब इस मामले में अगली बड़ी नजर HDFC Bank के संभावित NCLAT appeal पर होगी। यदि बैंक औपचारिक अपील दायर करता है और अन्य creditors भी उसके साथ कानूनी चुनौती देते हैं, तो ₹22,006.57 करोड़ के admitted claims और महज ₹6.5 करोड़ के प्रस्तावित repayment के बीच का यह विवाद अगले न्यायिक स्तर पर पहुंच जाएगा।









