नई दिल्ली: दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) के बाद जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची को लेकर विवाद और सवाल लगातार बढ़ रहे हैं। अब चांदनी चौक के एक सेटलमेंट का मामला सामने आया है, जहां जनवरी 2025 में 909 मतदाता दर्ज थे। SIR शुरू होने के समय यह संख्या घटकर 729 रह गई और 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में उसी क्षेत्र से सिर्फ एक मतदाता का नाम दिखाई दे रहा है। CNBC-TV18 की रिपोर्ट में चुनाव आयोग के दिल्ली के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर यह जानकारी सामने आई है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल SIR के दौरान हुए बदलाव की कहानी नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, इस इलाके में मतदाताओं की संख्या SIR शुरू होने से पहले ही 909 से घटकर 729 हो चुकी थी। इसके बाद SIR की ड्राफ्ट सूची में यह संख्या घटकर एक रह गई। हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि सभी नाम गलत तरीके से हटाए गए। प्रत्येक नाम के पीछे स्थानांतरण, मृत्यु, अनुपलब्धता या अन्य कारण हो सकते हैं और दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया अभी जारी है।
जनवरी 2025 में 909 वोटर, जून 2026 में 729
रिपोर्ट के अनुसार, चांदनी चौक के जिस सेटलमेंट का उदाहरण दिया गया है, वहां जनवरी 2025 में 909 मतदाता दर्ज थे। लेकिन जब जून 2026 में SIR प्रक्रिया शुरू हुई, तब तक मतदाताओं की संख्या घटकर 729 रह गई थी।
इसका मतलब है कि SIR के औपचारिक रूप से शुरू होने से पहले ही इस क्षेत्र में 180 मतदाताओं के नाम कम हो चुके थे। इसके बाद 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट सूची में केवल एक मतदाता का नाम दिखाई दिया।
यही अंतर दिल्ली की मतदाता सूची में SIR से पहले हुए बदलावों पर भी ध्यान खींचता है। नागरिक समूहों और कुछ संगठनों ने आरोप लगाया है कि SIR शुरू होने से पहले भी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए थे। हालांकि, इन सभी बदलावों को गलत या अवैध विलोपन मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि सामान्य मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान भी मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण, डुप्लीकेट नाम और अन्य कारणों से नाम हटाए जाते हैं।
दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में 47 लाख से ज्यादा नाम आगे नहीं बढ़े
दिल्ली में SIR के बाद 31 अगस्त को ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित की गई। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक करीब 47.5 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं हुए। इनमें स्थायी रूप से स्थानांतरित या लंबे समय से अनुपस्थित मतदाता, मृत मतदाता और एक से अधिक जगह दर्ज नाम जैसी श्रेणियां शामिल हैं।
यह आंकड़ा इसलिए बड़ा है क्योंकि दिल्ली में SIR से पहले लगभग 1.45 करोड़ मतदाता थे। ड्राफ्ट सूची में बड़ी संख्या में नाम आगे नहीं बढ़ने के बाद कई इलाकों में लोगों को अपने नाम की स्थिति जांचने की जरूरत पड़ रही है।
हालांकि, ड्राफ्ट सूची में नाम नहीं होना अंतिम रूप से मतदाता सूची से बाहर होना नहीं है। चुनाव आयोग ने दावा और आपत्ति दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की है, जिसके जरिए पात्र व्यक्ति अपना नाम दोबारा शामिल कराने की मांग कर सकते हैं।
लोगों के सामने अब क्या विकल्प है?
जिन लोगों का नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है, वे चुनाव आयोग के सामने दावा दाखिल कर सकते हैं। दिल्ली में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तारीख 30 सितंबर 2026 बताई गई है। इसके बाद अधिकारियों द्वारा दावों की जांच और उनका निपटारा किया जाएगा। अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर 2026 को प्रकाशित की जानी है।
इसका मतलब है कि चांदनी चौक के इस क्षेत्र में ड्राफ्ट सूची में केवल एक नाम दिखाई देना अंतिम स्थिति नहीं है। जिन लोगों के नाम छूट गए हैं, उनके पास दस्तावेजों के साथ दावा करने का अवसर अभी मौजूद है।
पहले भी सामने आ चुकी हैं वोटर लिस्ट की चौंकाने वाली गड़बड़ियां
दिल्ली SIR के दौरान केवल चांदनी चौक का मामला ही चर्चा में नहीं है। मंगोलपुरी विधानसभा क्षेत्र में एक ऐसा मामला भी सामने आया, जहां एक जीवित मतदाता को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में मृत दर्ज कर दिया गया। संबंधित मतदाता ने अपने दस्तावेजों के साथ नाम सूची में दोबारा दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की।
ऐसे मामलों ने SIR की प्रक्रिया, BLO स्तर पर डेटा सत्यापन और मतदाताओं को समय पर सूचना देने को लेकर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, किसी एक या कुछ मामलों के आधार पर पूरी SIR प्रक्रिया को गलत घोषित करना भी उचित नहीं होगा।
SIR से पहले ही क्यों घट रही थी दिल्ली की वोटर संख्या?
दिल्ली की मतदाता सूची में SIR से पहले भी लगातार बदलाव हुए। CNBC-TV18 की रिपोर्ट में नागरिक समूहों के विश्लेषण के हवाले से कहा गया है कि जनवरी 2025 में दिल्ली में करीब 1.56 करोड़ मतदाता थे, जबकि जून 2026 में SIR शुरू होने तक यह संख्या लगभग 1.45 करोड़ रह गई थी। यानी करीब 11 लाख की कमी पहले ही हो चुकी थी।
रिपोर्ट में अप्रैल, मई और जून 2026 के दौरान भी बड़ी संख्या में नामों में कमी का जिक्र किया गया है। नागरिक समूहों का कहना है कि SIR से पहले हुई इस कमी की पूरी जानकारी और उसके आधार की पारदर्शिता महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, मतदाता सूची में सामान्य पुनरीक्षण के दौरान भी नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया चलती रहती है।
यही वजह है कि SIR के दौरान हटे नाम और SIR से पहले सामान्य पुनरीक्षण में हटे नामों को एक ही श्रेणी में रखना सही नहीं होगा।
चांदनी चौक का आंकड़ा क्या बताता है?
729 से एक मतदाता तक पहुंचने वाला आंकड़ा निश्चित तौर पर असाधारण दिखाई देता है। लेकिन इसका सही अर्थ तभी सामने आएगा जब यह स्पष्ट हो कि बाकी 728 नाम किस कारण से ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं किए गए।
क्या वे लोग इलाके से स्थायी रूप से चले गए? क्या उन्हें दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया गया? क्या वे सत्यापन के दौरान अनुपस्थित पाए गए? क्या उनके नाम दूसरी जगह दर्ज थे? या फिर कुछ पात्र मतदाताओं के नाम प्रक्रिया में छूट गए? इन सवालों का जवाब दावों और आपत्तियों की जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
इसलिए इस आंकड़े को “वोटर लिस्ट में भारी गिरावट का उदाहरण” कहना तथ्यात्मक है, लेकिन इसे सीधे “729 वोटरों के वोट काट दिए गए” कहना अभी जल्दबाजी होगी।
चुनाव आयोग के सामने अब बड़ी चुनौती
SIR की सबसे बड़ी चुनौती अब केवल सूची तैयार करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वास्तविक और पात्र मतदाता गलती से अंतिम सूची से बाहर न रह जाएं। दिल्ली में लाखों नाम ड्राफ्ट सूची में आगे नहीं बढ़ने के बाद दावा-आपत्ति प्रक्रिया की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।
दूसरी ओर, फर्जी, डुप्लीकेट, मृत या स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना भी मतदाता सूची को साफ रखने के लिए जरूरी है। इसलिए SIR में दो चीजों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण है—गलत नाम हटाना और सही मतदाता का नाम बचाए रखना।
चांदनी चौक के 729 से एक नाम वाले मामले में भी अंतिम निष्कर्ष इसी जांच पर निर्भर करेगा कि शेष नामों की स्थिति क्या है और कितने लोग दावा करके अपने नाम वापस सूची में शामिल करा पाते हैं।
अंतिम वोटर लिस्ट का इंतजार
फिलहाल दिल्ली की SIR ड्राफ्ट वोटर लिस्ट अंतिम सूची नहीं है। 30 सितंबर तक दावे और आपत्तियां दाखिल की जा सकती हैं और इसके बाद चुनाव अधिकारियों द्वारा इनका निपटारा किया जाएगा। अंतिम सूची 4 नवंबर को सामने आएगी।
चांदनी चौक का यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि SIR के दौरान बूथ और क्षेत्र स्तर पर मतदाता संख्या में कितना बड़ा बदलाव हुआ है। अब असली सवाल यह है कि अंतिम सूची में यह संख्या कितनी होती है और क्या उन मतदाताओं में से अधिकांश अपने नाम दोबारा दर्ज कराने में सफल होते हैं। यही प्रक्रिया बताएगी कि मौजूदा ड्राफ्ट में दिख रही भारी कमी का कितना हिस्सा वास्तविक बदलाव है और कितना सुधार या पुनः सत्यापन के बाद वापस आएगा।











