नई दिल्ली: चुनाव आयोग के भीतर दो Election Commissioners की ओर से SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर दर्ज की गई आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों का हमला तेज हो गया है। शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए अलग-अलग राज्यों में दोबारा चुनाव कराने की मांग की है। हालांकि, ये मांगें विपक्षी नेताओं के राजनीतिक बयान हैं और अभी किसी चुनाव को रद्द करने या दोबारा कराने का कोई आधिकारिक फैसला नहीं हुआ है।
उद्धव ठाकरे ने किन राज्यों में दोबारा चुनाव की मांग की?
शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और जेल भेजने की मांग के साथ महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव दोबारा कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि इन राज्यों में दोबारा चुनाव बैलेट पेपर से कराया जाना चाहिए।
ठाकरे ने यह मांग The Indian Express की उस जांच के बाद की, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। ठाकरे ने कहा कि इन आपत्तियों से विपक्ष की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उठाए जा रहे सवालों को बल मिला है।
महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव नवंबर 2024 में हुए थे, जबकि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव अप्रैल 2026 में हुए। ठाकरे ने इन चुनावों की विश्वसनीयता की जांच की मांग भी उठाई है।
ममता बनर्जी ने क्या कहा?
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने पश्चिम बंगाल में SIR से पहले की मतदाता सूची के आधार पर दोबारा विधानसभा चुनाव कराने की मांग की।
ममता ने कहा कि जिन राज्यों में SIR के बाद चुनाव हुए और जहां BJP ने जीत हासिल की, वहां भी नए सिरे से चुनाव होने चाहिए। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि विपक्षी INDIA ब्लॉक इस मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन करेगा।
हालांकि ममता के आरोप राजनीतिक दावे हैं। चुनाव आयोग ने SIR और अपने फैसलों का बचाव करते हुए कहा है कि उसके निर्णय कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप और पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत फैसले रहे हैं। आयोग ने यह भी कहा है कि सदस्यों की लिखित टिप्पणियां और असहमति लोकतांत्रिक संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
केजरीवाल की मांग और भी व्यापक
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने चुनाव रद्द करने की मांग का दायरा और बढ़ा दिया। उन्होंने दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और हरियाणा में पिछले कुछ वर्षों में हुए चुनावों को रद्द कर दोबारा कराने की मांग की।
केजरीवाल ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर वोटों में कथित हेरफेर के गंभीर आरोप लगाए और उनकी गिरफ्तारी तथा अभियोजन की मांग की। उन्होंने चुनावी प्रक्रिया को लेकर सामने आई रिपोर्ट को अपने पहले से लगाए जा रहे आरोपों की पुष्टि के तौर पर पेश किया।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
पूरा विवाद The Indian Express की उस जांच के बाद तेज हुआ, जिसमें बताया गया कि Election Commissioners सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार SIR, मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, Form 6 तथा चुनावी डेटाबेस के संचालन से जुड़े फैसलों पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मामलों में दोनों अधिकारियों ने फैसलों की प्रक्रिया और उन्हें लेकर अपनी जानकारी के स्तर पर सवाल उठाए थे। एक मामले में एक Election Commissioner ने किसी फैसले को “unauthorised and illegal” बताया था। दोनों अधिकारियों ने चुनावी IT infrastructure और मतदाता डेटा से जुड़े कुछ बदलावों को लेकर कैबिनेट सचिव को भी पत्र लिखा था।
चुनाव आयोग का क्या कहना है?
चुनाव आयोग ने सामने आई रिपोर्ट के बाद कहा कि आंतरिक टिप्पणियां, सुझाव और सवाल संस्थागत checks and balances का हिस्सा हैं। आयोग के अनुसार पिछले एक साल में लिए गए उसके सभी फैसले, जिसमें SIR भी शामिल है, पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णय रहे हैं।
इसलिए एक तरफ विपक्षी नेता इन आपत्तियों को चुनाव आयोग के भीतर गंभीर मतभेद का प्रमाण बता रहे हैं, जबकि आयोग इन्हें निर्णय प्रक्रिया के दौरान होने वाले सामान्य संस्थागत विचार-विमर्श के रूप में पेश कर रहा है।










