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अयोध्या के बाद, भारतीय धर्मनिरपेक्षता को सतर्क होने की जरूरत, न कि धार्मिक रूढ़िवादिता के आगे झुकना चाहिए

RK News by RK News
January 28, 2024
Reading Time: 1 min read
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कपिल कोमिरेड्डि. :- अयोध्या में शो के स्टार थे नरेंद्र मोदी. राम का मंदिर, आधा-अधूरा और अभी भी चारों ओर जहां-तहां मचानों से ढका हुआ, प्रधानमंत्री की राजनीतिक समय सारिणी के हिसाब से पूरा किया गया. और उन्होंने वहां जो दिखावा किया, वह इसके प्रतीक के खोखलेपन का उदाहरण है. पुनर्जीवित हुए भारत के समावेशी प्रतीक के रूप में घोषित मंदिर के उद्घाटन समारोह में एक कड़ी पुलिस सुरक्षा वाले चकाचौंध की मेजबानी की जानी थी, जो केवल चुने हुए राजनेताओं, धनिकों और मशहूर हस्तियों के समूह के लिए खुला था. मोदी के नये भारत ने पुराने अधर्मों को ख़त्म नहीं किया. इसने उनका गर्व से प्रदर्शन किया. राम तो बस अपने घर आने के उत्सव में जैसे कहीं से आ भर गए थे.
प्रधानमंत्री, हमेशा की तरह, इस कार्यक्रम के आयोजन में इतने व्यस्त थे कि उन्हें इसके बाद की बातें तो उनके दिमाग में ही नहीं आईं. जैसे ही वह और उनके साथ अन्य पूजा करने वाले चले गए, मंदिर में अव्यवस्था फैल गई. इससे थोड़ी दूरी पर उन प्रॉपर्टीज़ के अवशेष थे जिन्हें शहर को सुंदर बनाने के लिए ध्वस्त किया गया था. वहां रहने और काम करने वाले लोगों की शिकायत है कि उन्हें बिना मुआवजा दिए विस्थापित कर दिया गया. अयोध्या में जो कुछ हुआ उसने भारत के पिछले दशक के अनुभव को एक ही दोपहर में समेट दिया. यह सभ्यता के पुनरुत्थान का उत्सव नहीं था. यह सभ्यतागत पतन की प्रदर्शनी थी
अयोध्या में हिंदुओं के असाधारण होने की धारणा विलुप्त हो गई. हिंदू धर्म के अनुयायी अब यह दावा नहीं कर सकते कि उनका धर्म स्वाभाविक रूप से ईश्वर की आड़ में सत्ता पर काबिज होने की धारणा के खिलाफ है. हिंदू राष्ट्रवादियों के हाथों में हिंदू धर्म उतना ही राजनीतिक उपकरण है जितना कि खालिस्तान के समर्थकों के हाथों में सिख धर्म और सिंहली वर्चस्ववादियों के हाथों में बौद्ध धर्म.
यह भारतीय बहुलवाद को जीने वाले सभी लोगों के लिए परीक्षा का समय है. हालांकि, निराशा में पीछे हटना पुराने भारत के क्रांतिकारी वादे को नष्ट करने की परियोजना को बढ़ावा देना है. लेकिन बने रहने के लिए, हमें सबसे पहले उस विचारधारा की प्रकृति के बारे में आरामदायक भ्रम को त्यागना होगा जो भारतीय राज्य के तथाकथित मान्य पंथ में खुद को मजबूत कर रही है. जो लोग भोलेपन से इस विश्वास में सांत्वना तलाशते रहते हैं कि हिंदुत्व खुद को सौम्य तरीकों से व्यक्त करेगा, वे उस हिसाब में देरी की उम्मीद कर रहे हैं जो अंततः होने पर और भी अधिक विनाशकारी होगा. दूसरी ओर, जो लोग खुद को भारतीय तरीके से धर्मनिरपेक्ष मानते हैं और इस सरकार और इसके सांप्रदायिक दर्शन का कट्टर विरोध करने में गर्व महसूस करते हैं, उनके पास करने के लिए खुद का काम है.
आधुनिक भारत के संस्थापकों द्वारा विरासत में मिला गणतंत्र – जिन्होंने विभाजन के घातक तर्क को खारिज करते हुए, महाद्वीपीय विविधता से बाहर एक लोकतांत्रिक संघ बनाया और ऐसे लोगों को नागरिक बनाया, जो सहस्राब्दियों से केवल पराधीनता को जानते थे – अकेले हिंदू राष्ट्रवादियों के प्रहार से ध्वस्त नहीं हुए. यह भीतर से फूट पड़ा.
मोदी का नया भारत
भारतीय धर्मनिरपेक्षता के लिए जो पारित हुआ – एक ऐसा आदर्श जिसे व्यवहार में लाने से कहीं अधिक प्रचारित किया गया – वह हिंदू समुदाय में सांप्रदायिक राजनीतिक चेतना के जागरण से बच नहीं सका. महत्वपूर्ण क्षणों में, इसके संरक्षकों और वकालत करने वालों ने, अपनी ओर से लड़ने के बजाय उन्हें त्याग कर इसके इच्छित लाभार्थियों को विफल कर दिया. यह सोचकर ही दम घुटता है कि, केवल चार साल पहले तक, मुस्लिम पत्नियों को उनके पतियों द्वारा तीन बार तलाक शब्द का उच्चारण करके संपत्ति की तरह त्याग दिया जा सकता था. हिंदू राष्ट्रवादी सरकार को, चाहे उसका मकसद कुछ भी हो, उस ढोंग को खत्म करने और मुस्लिम महिलाओं को कानून में गरिमा प्रदान करने की जिम्मेदारी सौंपी गई. धर्मनिरपेक्षता समान नागरिकता प्राप्त करने का एक साधन होना चाहिए – न कि धार्मिक रूढ़िवादिता को दूर करने की ताबीज.

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यह एक ऐसा क्षण है जब हर वर्ग के अवसरवादी अपनी नाक भौं सिकोड़ेंगे. धर्मनिरपेक्ष भारतीयों का विशेष दायित्व है कि वे उत्तर से दक्षिण तक जातीय-धार्मिक राष्ट्रवाद के क्षुद्र समर्थकों के खिलाफ विशेष रूप से सतर्क रहें, जो भारतीय एकता को बदनाम करने के लिए पहचान के इस संकट का उपयोग करने का प्रयास करेंगे. बाल्कनीज़ इंडिया की उनकी मांगों को सैद्धांतिक रूप से भी स्वीकार करना हिंदू राष्ट्रवाद के विभाजनकारी तर्क के सामने आत्मसमर्पण करना है.
मोदी के नये भारत ने अतीत की हर चीज़ को पूरी तरह से नकारा नहीं है; इसने पुराने भारत की सबसे बुरी आदतों-क्रोनिज्म, पर्सनैलिटी कल्ट, भ्रष्टाचार- को बरकरार रखा है और उनमें भयावह आत्म-करुणा, जानलेवा निगरानी, मॉब जस्टिस, संस्थागत तोड़फोड़ और प्रेस पर लगभग पूर्ण नियंत्रण जोड़ दिया है. आने वाले महीने और साल बेहद कठिन होंगे. लेकिन, इस देश में यात्रा करते हुए, मुझे यकीन नहीं हो रहा है कि भारतीय प्रयोग ख़त्म होने वाला है. भारत के बारे में सबसे स्पष्ट राजनीतिक तथ्य इस सरकार के खिलाफ पनप रही प्रतिक्रिया है. यह बिखरा हुआ और अव्यवस्थित है, और इसमें नेतृत्व की कमी है जो इसे एक सुसंगत राजनीतिक प्रतिक्रिया में संगठित करने में सक्षम है. हमारे मुश्किल में पड़े गणतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह नेतृत्व कब तक हमसे दूर रहेगा. (साभार दि प्रिंट)

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